Acute Myeloid Leukemia (AML) एक तेजी से बढ़ने वाला रक्त और अस्थि-मज्जा (Bone Marrow) का कैंसर है। इसमें अपरिपक्व (immature) मायेलॉयड कोशिकाएं तेजी से बढ़ती हैं, जिससे शरीर में सामान्य रक्त निर्माण (hematopoiesis) रुक जाता है। यह कुल कैंसर मामलों का लगभग 1% और वयस्क ल्यूकेमिया के 30–35% मामलों में पाया जाता है। हर साल लगभग 1 लाख लोगों में 3–5 नए मामले सामने आते हैं।

AML अधिकतर बुजुर्गों में पाया जाता है, जहां इसकी औसत आयु 65–70 वर्ष होती है, और यह पुरुषों में थोड़ा ज्यादा देखा जाता है। आधुनिक इलाज के बावजूद, इसका 5 साल का सर्वाइवल रेट केवल 25–30% है। युवा मरीजों में यह 40–50% तक हो सकता है, जबकि बुजुर्गों में यह 15% से भी कम रहता है।

हिस्टोपैथोलॉजी के अनुसार, Acute Myeloid Leukemia (AML) में अस्थि-मज्जा (Bone Marrow) बहुत अधिक सक्रिय (hypercellular) हो जाती है और इसमें 20% या उससे अधिक मायेलोब्लास्ट कोशिकाएं पाई जाती हैं—यह इसकी पहचान का मुख्य मापदंड है। परिधीय रक्त जांच (Peripheral Blood Smear) में अपरिपक्व ब्लास्ट कोशिकाएं दिखाई देती हैं, जिनमें नाभिक (nucleus) बड़ा और साइटोप्लाज्म कम होता है। कुछ प्रकार के AML में Auer rods नामक सुई जैसी संरचनाएं भी देखी जाती हैं, जो इस रोग की खास पहचान मानी जाती हैं।

Acute Myeloid Leukemia (AML) केप्रकार

Acute Myeloid Leukemia (AML) को कोशिकाओं के आकार (morphology), जीन (genetics) और रोग के व्यवहार के आधार पर अलग-अलग प्रकारों में बांटा जाता है। इसके लिए मुख्य रूप से दो सिस्टम उपयोग में आते हैं—FAB (French-American-British) और WHO (World Health Organization) classification।

1) FAB Classification (कोशिकाओं के आधार पर)

a) M0 – बहुत कम विकसित (minimally differentiated) AML

b) M1 – बिना परिपक्वता वाला AML

c) M2 – परिपक्वता के साथ AML

d) M3 – Acute Promyelocytic Leukemia (APL)

e) M4 – Myelomonocytic Leukemia

f) M5 – Monocytic Leukemia

g) M6 – Erythroid Leukemia

h) M7 – Megakaryoblastic Leukemia

यह वर्गीकरण डॉक्टरों को AML के प्रकार को समझने और सही इलाज तय करने में मदद करता है।

FAB सिस्टम में ल्यूकेमिया कोशिकाओं को माइक्रोस्कोप में उनके आकार और बनावट के आधार पर पहचाना जाता है।

WHO Classification (अधिक उन्नत और क्लिनिकली महत्वपूर्ण)

A) Genetic बदलाव वाले AML

a) t(8;21) वाला AML.

b) inv(1) या t(16;16) वाला AML.

c) t(15;17) (APL).

d) NPM1 mutation वाला AML.

e) FLT3 mutation वाला AML.

B) Myelodysplasia से संबंधित AML.

यह पहले से मौजूद बोन मैरो (Bone Marrow) की बीमारी से विकसित होता है

C) Therapy-Related AML

यह कीमोथेरेपी या रेडिएशन के बाद विकसित हो सकता है

D) AML NOS (Not Otherwise Specified)

ऐसे मामले जो ऊपर की किसी श्रेणी में नहीं आते

यह वर्गीकरण बीमारी की सही पहचान और बेहतर इलाज योजना बनाने में मदद करता है।

आयुर्वेदमेंएएमएल(Acute Myeloid Leukemia) कासंबंध– सरलसमझ

आयुर्वेद के अनुसार एएमएल को समझने के लिए रक्तवाह स्त्रोतस (Raktavaha Srotas), मज्जावाह स्त्रोतस (Majjavaha Srotas) और प्लीहोदर (Plihodara) को समझना जरूरी है।

1) रक्तवाह स्त्रोतस (Raktavaha Srotas)

यह रक्त के निर्माण और संचार के लिए जिम्मेदार होता है, जिसका मूल यकृत (लिवर) और प्लीहा (तिल्ली) में माना गया है।

अत्यधिक गरम, तैलीय, तीखा भोजन और धूप/अग्नि के संपर्क से यह स्त्रोतस दूषित हो जाता है।

इसके कारण शरीर में एनीमिया, रक्तस्राव, त्वचा रोग, कमजोरी और रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

2) मज्जावाह स्त्रोतस (Majjavaha Srotas)

यह अस्थि (हड्डियों) और जोड़ों से जुड़ा होता है तथा बोन मैरो (मज्जा) से संबंधित है।

अधिक दबाव, चोट, गलत आहार और अवरोध पैदा करने वाले कारणों से यह दूषित होता है।

इसके लक्षणों में हड्डियों में दर्द, कमजोरी, चक्कर आना और थकान शामिल हैं।

3) प्लीहोदर (Plihodara)

यह प्लीहा (तिल्ली) के बढ़ने से संबंधित स्थिति है।

दूषित रक्त और कफ के कारण तिल्ली बढ़ जाती है, जिससे पेट के बाईं ओर सूजन, कमजोरी, हल्का बुखार और पाचन शक्ति की कमी होती है।

एएमएलकाआयुर्वेदिकसंबंध

एएमएल को आयुर्वेद में रक्तवाह और मज्जावाह स्त्रोतस की एक साथ विकृति के रूप में समझा जा सकता है।

बोन मैरो में असामान्य कोशिकाओं की वृद्धि → मज्जावाह स्त्रोतस दोष

रक्त निर्माण में कमी और खराब संचार → रक्तवाह स्त्रोतस दोष

साथ ही, प्लीहा का बढ़ना (splenomegaly) प्लीहोदर से मिलता-जुलता है।

इस प्रकार, एएमएल को आयुर्वेद में त्रिदोषज (मुख्य रूप से पित्त-कफ) विकार माना जाता है, जिसमें रक्त धातु और मज्जा धातु दोनों प्रभावित होती हैं।

👉 डॉ. रवि गुप्ता, Ayurveda Cancer Consultant के अनुसार, इस तरह की समग्र (holistic) समझ से रोग की गहराई को समझकर उपचार की सही दिशा तय की जा सकती है।

डॉ. रविगुप्ता– एएमएल(Acute Myeloid Leukemia) केलिएआयुर्वेदिकउपचारविशेषज्ञ

डॉ. रवि गुप्ता, Ayurveda Cancer Consultant एएमएल (Acute Myeloid Leukemia) के आयुर्वेदिक प्रबंधन में एक अनुभवी विशेषज्ञ माने जाते हैं। यह रोग रक्त और बोन मैरो से जुड़ा तेजी से बढ़ने वाला कैंसर है, जिसे वे आयुर्वेद के सिद्धांतों—विशेषकर रक्तवाह स्त्रोतस और मज्जावाह स्त्रोतस—के आधार पर जड़ से संतुलित करने का प्रयास करते हैं।

उनका उपचार आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद का संतुलित (integrative) दृष्टिकोण अपनाता है, जिससे मरीजों की इम्युनिटी, ताकत और जीवन गुणवत्ता में सुधार होता है, खासकर जब वे कीमोथेरेपी जैसे उपचार ले रहे होते हैं। उनके उपचार में आयुर्वेदिक औषधियां (जैसे गुडूची, अश्वगंधा, मंजिष्ठा) और पंचकर्म (जैसे बस्ती, विरेचन) शामिल हैं, जो शरीर को डिटॉक्स करने और बोन मैरो को पोषण देने में मदद करते हैं।

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